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Sunday, December 5, 2010

माझिया सख्याला येऊ दे जाग


कळेना   आज  माझा  काय  झाला  गुन्हा.
अव्हेरशी  का मज, आज  पुन्हा  पुन्हा.
निद्रेच्या  विळख्यात   तू , मज  कळेना  राज.
माझिया  सख्याला , येऊ  दे  जाग.

तुजसाठी  केला  मी  सारा  शृंगार.
आसुसले  मन  ,तन  झाले  अंगार.
विराण  भासे  मज , तुजवीण  सारे  जग.
माझिया  सख्याला , येऊ  दे  जाग.

मोहवू  पाहे   मज , रातराणीचा  गंध.
पर  तुझ्या  गंधाचा , मज  लागे  छंद.
मर्दानी  चेहऱ्यावर  वाहे , पौरुष्याची  झाग.
माझिया  सख्याला, येऊ  दे  जाग.

संगतीत  धावे  काळ, थांबला  जणू  आज.
तुझी  ना  साथ , असे  रातकिड्यांची  जाग.
परसाच्या  केवड्यात  फुत्कारतो  नाग.
माझिया  सख्याला , येऊ  दे  जाग.

साहवेना  तुझा  दुरावा,  आता  एकही  क्षण.
आवरू  किती  तयाला , स्वैर  भैर  मन.
पर  जागवू  कशी   बाई, मज  येई  लाज.
माझिया  सख्याला, येऊ  दे  जाग

उगवला  बघ  आता  तो , पहाटेचा  शुभ्र   तारा.
कवळून  मज , दे  मिठीचा  धुंद  फुंद  उबारा.
दीर्घ  चुंबनात  विरू  दे , तुझा  सर्व  राग.
माझिया  सख्याला , येऊ  दे  जाग.

कवी : बाळासाहेब तानवडे
© बाळासाहेब तानवडे - २३ /११/२०१०

स्वप्न प्रिये …


तुझेच  स्वप्न  सदा  सर्वदा. 
घायाळ  करी  तुझी  हर  एक  अदा. 
किती  दि  कल्पनेतच  रमावे. 
स्वप्न  प्रिये  तू  आता  अवतरावे. 

आठवून  तुझे  ते  निळेशार  नयन.
नाही  चीतास  एकही  क्षण  चैन. 
मज  एकवार  तू  चंचले  पाहावे. 
स्वप्न  प्रिये  तू  आता  अवतरावे. 

भेटीचा  तो  अमृत  योग  यावा. 
मैफिलीत  धुंद  रंग  तू  भरावा. 
ते  सप्तसूर  तू  समरसून  गावे. 
स्वप्न  प्रिये  तू  आता  अवतरावे. 

किती  दि  हा  दुरावा  सहावा. 
मिठीत  जगाचा  विसर  पडावा. 
अवीट  क्षण  ते  तिथेच  थिजावे. 
स्वप्न  प्रिये  तू  आता  अवतरावे. 

कवी : बाळासाहेब तानवडे

© बाळासाहेब तानवडे०४/१२/२०१०